इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जालौन जिले के बहुचर्चित दोहरे हत्याकांड मामले में दोषी ठहराए गए पूर्व विधायक छोटे सिंह को राहत देने से इनकार कर दिया है। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ एवं न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने उनकी सजा निलंबन और जमानत अर्जी खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि मामले की गंभीरता और उपलब्ध साक्ष्य आरोपी के खिलाफ मजबूत हैं।
यह आदेश आपराधिक अपील संख्या 8800/2025 में पारित किया गया। उल्लेखनीय है कि छोटे सिंह ने 11 सितंबर 2025 को अपर सत्र न्यायाधीश (ईसी एक्ट), जालौन द्वारा सुनाई गई सजा को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी। साथ ही, सजा निलंबन और जमानत की मांग की गई थी। हाईकोर्ट ने 16 मार्च 2026 को सुनवाई पूरी कर निर्णय सुरक्षित रखा था, जिसे 19 मार्च 2026 को सुनाया गया।
क्या है मामला?
यह सनसनीखेज घटना 30 मई 1994 की है, जब चुर्खी थाना क्षेत्र के एक गांव में दिनदहाड़े घर में घुसकर अंधाधुंध फायरिंग की गई थी। इस हमले में राजकुमार और जगदीश शरण की मौके पर ही मौत हो गई थी, जबकि एक अन्य व्यक्ति गंभीर रूप से घायल हो गया था। घटना के बाद राम कुमार द्वारा थाना चुर्खी में एफआईआर दर्ज कराई गई थी।
जांच के दौरान छोटे सिंह का नाम सामने आया और उन्हें अन्य आरोपियों के साथ चार्जशीट किया गया। लंबी सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट ने उन्हें दोषी ठहराते हुए धारा 302/149 के तहत आजीवन कारावास, धारा 307/149 के तहत 10 वर्ष कारावास सहित अन्य धाराओं में सजा सुनाई।
बचाव पक्ष की दलीलें
अपीलकर्ता पूर्व विधायक छोटे सिंह के अधिवक्ता इंद्रपाल सिंह राजपूत, गजेंद्र सिंह चौहान, नीरज श्रीवास्तव, विजय सिंह सेंगर और विष्णु कांत ने कोर्ट में तर्क दिया कि पूर्व विधायक छोटे सिंह का नाम प्रारंभिक एफआईआर में नहीं था और उन्हें बाद में झूठा फंसाया गया। साथ ही, गवाहों को मृतकों का परिजन बताते हुए उनकी गवाही पर सवाल उठाए गए। यह भी कहा गया कि मेडिकल साक्ष्य और हथियारों के प्रकार में विरोधाभास है। बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि आरोपी पहले जमानत पर रहा और उसने कभी शर्तों का उल्लंघन नहीं किया।
अदालत का रुख
खंडपीठ ने बचाव पक्ष की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि एफआईआर में नाम न होना अपने आप में निर्णायक नहीं है, खासकर जब घटना अत्यंत भयावह परिस्थितियों में हुई हो। अदालत ने कहा कि मृतकों के परिजन स्वाभाविक गवाह हैं और उनकी गवाही को केवल रिश्तेदारी के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह भी माना कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट, प्रत्यक्षदर्शी गवाहों के बयान और अन्य साक्ष्य आरोपी की संलिप्तता को स्पष्ट रूप से सिद्ध करते हैं। साथ ही आरोपी के आपराधिक इतिहास को भी गंभीरता से लिया गया।
महत्वपूर्ण टिप्पणी
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा दोषसिद्धि के बाद आरोपी के पक्ष में ‘निर्दोषता की धारणा’ समाप्त हो जाती है। ऐसे में सजा निलंबन के लिए ठोस और पर्याप्त आधार आवश्यक होते हैं, जो इस मामले में नहीं पाए गए। फिलहाल, इस फैसले के बाद पूर्व विधायक छोटे सिंह को उरई जेल में ही रहना होगा।



