इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि पुलिस को किसी संदिग्ध को पूछताछ के दौरान अपनी पसंद के वकील की मौजूदगी के अधिकार की जानकारी औपचारिक गिरफ्तारी से पहले भी देनी होगी। पुलिस किसी व्यक्ति को बिना गिरफ्तारी दर्ज किए थाने बुलाकर कई घंटे पूछताछ करने के आधार पर इस कानूनी सुरक्षा से बच नहीं सकती। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने यह टिप्पणी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई के दौरान की।
कोर्ट ने कहा कि पूछताछ के लिए थाने लाए गए व्यक्ति को उसके अधिकार की जानकारी देना पुलिस का दायित्व है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि वकील को पूरी पूछताछ के दौरान लगातार मौजूद रहने का अधिकार होगा। यदि संदिग्ध को इस अधिकार की जानकारी दिए बिना पूछताछ की जाती है, तो उससे प्राप्त कथित आत्म-दोषी बयान की वैधता प्रभावित हो सकती है।
मामला प्रयागराज के सोरांव थाने से जुड़ा है। याचिकाकर्ता रवि चौरसिया के अनुसार, पुलिस ने 14 सितंबर 2026 को उसे अयोध्या से हिरासत में लेकर थाने पहुंचाया, लेकिन गिरफ्तारी दर्ज नहीं की। अगले दिन उसकी मां थाने पहुंचीं और बाद में हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की गई।
पुलिस ने 16 सितंबर को सुबह 10:45 बजे रवि की औपचारिक गिरफ्तारी दर्शाई। इसके बाद चिकित्सकीय परीक्षण कराकर उसे मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया, जहां से न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने थाने की सीसीटीवी फुटेज भी तलब की। पुलिस अधिकारियों ने जवाबी हलफनामे में उसकी हिरासत स्वीकार की, जबकि जनरल डायरी में प्रविष्टि न होने को अनजाने में हुई गलती बताया। कोर्ट ने इस स्पष्टीकरण को स्वीकार नहीं किया।
खंडपीठ ने कहा कि 24 घंटे से अधिक समय तक हिरासत में रखने के बावजूद मजिस्ट्रेट के सामने पेश न करना प्रारंभिक अवैधता थी। बाद में की गई गिरफ्तारी और न्यायिक रिमांड से पिछली अवैध हिरासत वैध नहीं हो जाती। कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 के तहत प्राप्त अधिकारों का उल्लेख करते हुए ‘फ्रूट ऑफ द पॉइजनस ट्री’ सिद्धांत पर भी चर्चा की।
हाईकोर्ट ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार करते हुए रवि चौरसिया को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया, बशर्ते वह किसी अन्य मामले में वांछित न हो। साथ ही उसे 30 हजार रुपये मुआवजा देने के निर्देश दिए। फैसले में पुलिस को याद दिलाया गया कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता और कानूनी अधिकारों की रक्षा औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज करने तक सीमित नहीं है।



