Saturday, January 24, 2026
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11 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट करेगा मध्यप्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा की अयोग्यता खारिज करने वाले आदेश पर सुनवाई

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सोमवार को सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति अभय श्रीनिवास ओक और न्यायमूर्ति पंकज मिथल की खंडपीठ ने सिविल अपील संख्या 811/2019 भारत चुनाव आयोग बनाम नरोत्तम मिश्रा की अयोग्यता संबंधी अपील पर सुनवाई की, खंडपीठ ने सुनवाई की अगली तारीख 11 अक्टूबर तय की है। यह अपील भारत चुनाव आयोग द्वारा दिल्ली हाईकोर्ट के 2018 के फैसले को चुनौती देते हुये दायर की गई थी, जिसने नरोत्तम मिश्रा को अयोग्य ठहराते हुये 2017 में पारित भारत चुनाव आयोग का आदेश रद्द कर दिया था।

न्यायमूर्ति अभय श्रीनिवास ओक और न्यायमूर्ति पंकज मिथल की खंडपीठ में सुनवाई शुरू होने पर एमपी के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता आर्यमा सुंदरम ने खंडपीठ को अवगत कराया कि मामला न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस के समक्ष सूचीबद्ध किया जाना है। उन्होंने कहा, “ऐसा लगता है कि कुछ त्रुटि है, मामला न्यायमूर्ति बोस के समक्ष सूचीबद्ध है।” हालांकि, बेंच ने जवाब दिया कि वे भी भ्रमित हैं और सभी मामले भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा सौंपे गये हैं। खंडपीठ ने कहा, “हमें भी नहीं पता, हमने भी पूछ लिया।” कोर्ट ने आगे बताया कि निर्देशों के मुताबिक मामला यहां सूचीबद्ध है। इस पर गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सुंदरम ने खंडपीठ से आगामी चुनावों के कारण मामले को नवंबर के बाद सूचीबद्ध करने का अनुरोध किया।

हालांकि, कांग्रेस नेता राजेंद्र भारती जिन्होंने मामले की जल्द सुनवाई की मांग करते हुये आवेदन दायर किया है उनकी ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा, “हम इसे छोड़ नहीं सकते” मामले की संक्षिप्त पृष्ठभूमि मामला साल 2008  में हुए मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव का है। इस चुनाव में खर्च की सीमा 10 लाख थी। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले डॉ. नरोत्तम मिश्रा को विजयी उम्मीदवार घोषित किया गया।

उन्होंने लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (आरपीए) की धारा 77 के अनुसार आवश्यक 2,40,827/- के व्यय का खुलासा किया। 2009 में चुनाव आयोग के समक्ष की गई शिकायत में दतिया विधानसभा क्षेत्र से तत्कालीन कांग्रेस उम्मीदवार राजेंद्र भारती ने आरोप लगाया कि डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने 2008 में हुये चुनावों के दौरान 4,79,860/- के कुछ समाचार विज्ञापन प्रकाशित किए थे। उन्होंने इसका खुलासा नहीं किया था। यह खर्च आरपीए की धारा 77 के तहत आवश्यक उनके व्यय में शामिल होना चाहिये।

इसके अनुसार, 23 जून, 2017 को चुनाव आयोग ने मिश्रा को आरपीए की धारा 10ए के तहत आदेश जारी होने की तारीख से तीन साल के लिए अयोग्य घोषित कर दिया। मिश्रा ने दिल्ली हाईकोर्ट की एकल न्यायाधीश वाली पीठ के समक्ष उक्त आदेश पर आपत्ति जताई। हालांकि, न्यायालय ने अपील खारिज कर दी।

प्रासंगिक रूप से जब अपील डिवीजन बेंच के समक्ष दायर की गई तो न्यायालय ने ईसी और एकल न्यायाधीश के आदेश को रद्द करते हुए कहा, “यह माना जाता है कि चुनाव आयोग और एकल न्यायाधीश दोनों ने वर्तमान मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में नियम 89 और 90 के सठित धारा 10 ए, 77 और 78 की व्याख्या करने में गलती की है; सबूत का ऐसा कोई तरीका नहीं है, जिसे कानून द्वारा स्थापित न्यायाधिकरण द्वारा उचित रूप से स्वीकार किया जा सके। साथ ही यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि डॉ. मिश्रा ने 42 आपत्तिजनक लेखों/विशेषताओं/चुनाव अपीलों में से प्रकाशन के लिए अपनी ओर से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से व्यय किया था या अपने एजेंट के माध्यम से अधिकृत किया था। इसलिए चुनाव आयोग के विवादित आदेश और इसे बरकरार रखने वाले एकल न्यायाधीश का फैसला रद्द किया जाना चाहिए। ” सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में भारत चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती देने वाली मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में दायर नरोत्तम मिश्रा की याचिका को दिल्ली हाईकोर्ट ट्रांसफर कर दिया था।

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